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Showing posts from September, 2024

नींद आती थी जिसे तेरे....💔🥀🥺

 नींद आती थी जिसे तेरे साथ बातें करने के बाद सोच वो कैसे सो सकेगा तेरे रूठ जाने के बाद|

पुरानी पीढ़ियों को मालूम है...💔🥀🥺

 पुरानी पीढ़ियों को मालूम है एक छत के नीचे घर चलानें का तरीका आज के लोगों को लोगों से तकलीफ़ बहोत है...🥺🥺

मोहब्बत का दर्द दिल में छुपाया...🥺💔🥀

"मोहब्बत"❤️ का "दर्द"💔 दिल में छुपाया बहुत है,  सच कहूं उसकी "मोहब्बत"🥺 ने "रुलाया"🥺 बहुत है।

ना पा सकूँ ना भुला सकूँ तू मेरी...🥺💔🥀

ना पा सकूँ ना भुला सकूँ तू मेरी "मजबूरी" सा हैं  तेरे बिना जी रहे हैं और जी भी लेगें  फिर भी तू "जरूरी" सा हैं..🥺💔🥀🥺|

शिकायतों से घर नहीं चलते...🥺💔🥀

 शिकायतों से "घर" नहीं चलते साहब  उम्र चाहें जो भी हो "कमाना" पड़ता है!🥺💔🥺

किसी को जादूगर बनाया....

किसी को "जादूगर" बनाया,  तो किसी को "मदारी" बनाया, यह कितना "जालिम" है पेट भी,  न जाने कितने को "परदेसी" बनाया...🥺🥀💔।

ख्वाहिशों का काफिला...🥺🥀💔

"ख्वाहिशों का "काफिला" भी बड़ा अजीब है  अक्सर वहीं से "गुजरता" है, जहां रास्ता न हो।

छोड़ा कही का भी नही....

 छोड़ा कही का भी नही.... इस "दुनियां"🌏 ने.... मालिक... फिर भी तेरा "करम"🙏 हैं कि... जिए जा रहे हैं...!!🥺❤️

हर शख्स को पसन्द..💔🥀🤫

 हर शख्स को "पसन्द"🤫 आओगे तुम  जिस दिन "कंधो"💔 पर जाओगे तुम..!

तेरे काबिल ए-जिन्दगी...!

 कैसे करूं मैं खुद को तेरे "काबिल ए-जिन्दगी" जब मैं "आदतें" बदलता हूं तूं "शर्तें" बदल देती है..!🥺🥀💔

मेरी तो कब्र के कीड़े भी भूखे...🥺🥺💔🥀

 मेरी तो कब्र के कीड़े भी "भूखे" ही "मरेंगे",  कुछ इस तरह खाया है "मोहब्बत" ने मुझे !

वो जमाना अब नहीं रहा दोस्तों.

 वो "जमाना"🌏 अब नहीं रहा दोस्तों..  जब लोगों को किसी से "बिछड़कर"💔 अफसोस🥺 होता था..

मेरी ज़िंदगी में ये दौर

  मेरी "ज़िंदगी" में ये दौर भी आ गया चलो अच्छा है उसकी "जिंदगी"🥺 मैं कोई और आ गया।💔

इश्क़ ना होने के दो ही तरीके❤️🥀🥺

" इश्क़"🥀 ना होने के दो ही तरीके थे , या "दिल"❤️ ना होता, या तुम 🥺ना होते ! 💔

लोग कहते ही की tu...😡👥👀

"लोग"👥 कहते हैं कि तू अब भी "खफा",😡 है मुझ से तेरी "आंखों"👀 ने तो कुछ और कहा है मुझ से..!

कही से काश तुम...💔💔

 कहीं से काश तुम "आवाज़" देते । "ग़मों" को हम कोई तो "साज़" देते । तमन्ना ये भी "दिल" में है,  तुम्हे हम, तुम्हारे नाम से "आवाज़" देते । बिखरना तय है फिर भी "मुस्कराना, गुलों को और क्या "अंदाज़" देते । बहुत "तौहीन" होती "आँसुओं" की, सदाओं को अगर "अल्फाज़" देते ।

जुल्फ बनकर बिखर गया मौसम

 ज़ुल्फ़ बन कर बिखर गया मौसम, धूप को छांव कर गया मौसम.. मैंने पूछी थी ख़ैरियत तेरी, मुस्करा कर गुज़र गया मौसम.. फिर वो चेहरा नज़र नहीं आया, फिर नज़र से उतर गया मौसम.. तितलियाँ बन के उड़ गयीं रातें, नींद को ख़्वाब कर गया मौसम.. फूल ही फूल थे निगाहों में, दाग ही दाग भर गया मौसम... तुम ना थे तो मुझे पता न चला, किधर आया किधर गया मौसम... आप के आने की ख़बर सुन कर, जाते जाते ठहर गया मौसम...|